जो लोग मुझे जानते हैं उन्हें पता है कि मुझे इस बात का अफ़सोस है कि मैं डांसर नहीं बन पाया। इसके लिए मैं अपने परिवार विशेषकर अपने माता-पिता को दोषी ठहरता हूँ कि उन्होंने मुझे नाचने नहीं दिया। लेकिन जिन् कलाकारों को आज़ादी मिली क्या उनका जीवन मुझसे बेहतर है? ऐसे में ख़याल आता है सुशांत दिग्विकर और इवांका दास जैसों का जिन्होंने अपने हुनर के दम पर एक ऊँचा मुकाम हासिल किया है। लेकिन हर कलाकार के सफर और संघर्ष की मंजिल इतनी खूबसूरत नहीं होती।
मेरी कहानी है मध्य प्रदेश के जबलपुर के ऐसे कलाकार की जिसने अपनी जिद्द और धैर्य से परिवार और रिश्तेदारों के बीच अपने हुनर का लोहा मनवाया। नाचने-गाने की जिद्द और सही वक़्त का धैर्य से इंतज़ार करना - इन्हीं दो बातों ने मेरा ध्यान खींचा। ये किसी प्रसिद्ध कलाकार की कहानी नहीं है, लेकिन एक आम कलाकार की खास कहानी है।
फ़रवरी 2020 : किसी ने बताया नहीं कि मैं गे हूँ?
घर में भतीजे के मुंडन का कार्यक्रम है और पूरा आंगन मेहमानों से भरा है। उस वक़्त वो तैयारियों और कार्यक्रमों में व्यस्त था। घर से बाजार और बाजार से घर, सुबह से यही चल रहा था। दोपहर को जब वो घर पहुंचा तो अपनी स्कूटी खड़ी करके फ़ोन देखा तो बड़े भाई, भाभी और बहन सबके मिस्ड कॉल थे। उसे लगा कि कोई जरुरी काम है तभी सबने कॉल किये हैं। जल्दी-जल्दी अंदर गया तो माता-पिता के चेहरे पर अजीब सा सुकून था। बहन का चेहरा भी खिला हुआ था। आगे बढ़ा तो पिता के उम्र के एक मेहमान ने सिर पर हाथ रखा और एक लिफ़ाफ़ा पकड़ाने के लिए दूसरा हाथ आगे बढ़ाया। उसने हैरानी से सभी परिवार वालों की ओर देखा। जो आँखों में सवाल थे उनका जवाब भाभी ने घूँघट में से ही सिर हिलाकर ना में दिया।
चुप्पी तोड़ते हुए बहन चहकते हुयी बोली, "पसंद आ गया है तू, अपनी बेटी के लिए रिश्ता लाये हैं। नेग दे रहे हैं तुझे, रख ले और पैर छू।" उसे एक पल के लिए तो समझ ही नहीं आया कि आखिर चल क्या रहा है। भतीजे के मुंडन के बीच ये सगाई-संबंध कैसे आ गया? पिता ने गुस्साई नज़रों से उसे बात मान लेने का इशारा किया और ऐसा ही कुछ भाव भाई के चेहरे पर भी था। लेकिन माँ और भाभी के चेहरे पर अब बेचैनी और परेशानी पसरी पड़ी थी। असमंजस में यकायेक उसने किसी की बात ना मानते हुए अपने दिल की सुनने का फैसला लिया।
उसने हाथ जोड़ हुए कहा, "इन्हें किसी ने बताया नहीं कि मैं गे हूँ?" घर वालों के चेहरों का रंग उड़ गया। आश्चर्य से उस आदमी ने सवाल किया, "गे क्या होता है, बेटा?" तो उसने जवाब दिया कि, "अभी मैं समझा भी दूँ तो आप तुरंत समझ नहीं पाएंगे, बस इतना समझ लीजिये कि मैं आपकी बेटी के लिए योग्य वर नहीं हूँ। मुझे लड़कियों में दिलचस्पी नहीं है।" पिता सिर पकड़ कर पास रखी कुर्सी पर बैठ गए और माँ बेहोश हो गयी, जिन्हें भाभी और बहन भीतर कमरे में ले गए। गुस्साया भाई पास आया और फ़िल्मी अंदाज़ में बदत्तमीज़ बोलते हुए एक थप्पड़ जड़ दिया।
लेकिन उस आदमी के चेहरे पर संतोष था। उसने बड़े ही प्यार से सिर पर फिर से हाथ रखा और बोला "बेटा, बहुत अच्छा किया जो तुमने छुपाया नहीं और सब सच बता दिया। बेटी की ज़िन्दगी का सवाल है।" बस इतना कह कर वो वहां से चले गए, और धीरे धीरे बाकी मेहमान भी। बस अब घर में परिवार वालों के बीच क्लेश मचा हुआ था। भाभी सब जानती थी इसलिए वो पहले ही रिश्ते के लिए सहमत नहीं थी। जिस बात को माँ नज़रअंदाज़ करती आ रही थी, आज उसने सबके सामने बोल कर सबका भ्रम तोड़ दिया। भाई और पिता की भी गलतफहमी दूर हो गयी। बहन के चेहरे पर अफ़सोस था कि वो ये बात कभी क्यों समझ नहीं पायी।
आज़ादी की रात
जितने शोर-गुल वाली दोपहर और शाम थी, उतनी ही शांत उस घर की रात थी। पैरों पर अजीब सी जलन के एहसास ने आधी रात को उसकी नींद तोड़ी तो उसके होश उड़ गए। वो पलंग के सिर की तरफ पैर और पैर की तरफ सिर करके सोया था और इसी गलतफहमी में बाप-भाई ने उसके पैरों की तरफ आग लगा दी। वो उठा और जोर से चीखना चिल्लाना शुरू किया। घर की सभी औरतें आ गयी और आग बुझाई। पिता और भाई की धक्का-मुक्की में माँ का सिर दीवार पर लगा और वो बेहोश हो गयी।
थोड़ा भावुक और तनावपूर्ण ही सही लेकिन ये वो पल था जब उसे अपनी आज़ादी मिल गयी थी। माँ को होश आया तो वो गुस्से में अपने ही पति और बड़े बेटे के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज़ करवाने उसे थाने ले गयी। पुलिस वालों ने समझाया कि घर का मामला है आपस में ही समझ लो तो बेहतर है, कहाँ कोर्ट कचेहरी के चक्करो में पड़ोगे! एक तरफ़ घर के मर्दों कि दकियानूसी सोच और घृणा थी तो दूसरी ओर माँ की ममतामयी ज़िद।
तूफ़ान के बाद किसी गाँव उजड़ जाने जैसी थी उस घर की सुबह। सब एक दूसरे को सँभालने में लगे थे लेकिन माँ की ज़िद के आगे बाप और भाई को घुटने टेकने पड़े। फ़िर भी वो उसे पूरी तरह अपना नहीं सके। हर रोज़ उसे ताने सुनने पड़ते - "कैसा हिजड़ा बेटा पैदा किया है!", "समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा"!, "रण्डियों जैसे नाचते फिरता है!" और ना जाने क्या क्या! घर वालों के साथ साथ पडोसी, मिलने वाले और रिश्तेदार भी मिलते तो ऐसे हिम्मत बंधाते जैसे वाकई इस घर के छोटे बेटे से कोई गुनाह हो गया हो। ख़ैर उसे इस बात का संतोष था कि अब उसके पास उसकी आज़ादी है। अब उसे कुछ छुपाने की जरुरत नहीं है।
जिम्मेदारियों के बोझ वाला लॉकडाउन
फरवरी बीती और साल का वो महीना आया जिसने पूरी दुनिया को अपने घर में कैद कर दिया। घर का ख़र्च भाई की दुकान के पैसों से चलता था वो आमदनी अचानक रुक गयी। दो महीने बाद भाई ने भी हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में जब घर में राशन ख़तम हुआ तो उसने अपनी बचत के कुछ पैसे माँ के हाथ में थमा दिए। उस रात उसके परिवार का पेट उसके पैसों से भरा जो उसने 'नाच-गाकर' कमाए थे। वो 'नाच' जो उसके पिता और भाई को कभी रास नहीं आया। 30 सालों में पहली बार उसे जिम्मेदारी का एहसास हुआ था और वो खुश था कि उसके मेहनत घरवालों के कुछ तो काम आयी।
उसे लगा कि सब ठीक चल रहा है तभी पिता की तबियत बिगड़ गयी। देर रात अस्पताल में भर्ती करवाया और सुबह अस्पताल वालों ने इलाज शुरू करने से पहले 15000 रूपए जमा करवाने को कहा। उसने बिना खुद के भविष्य की चिंता किये अपनी जमा पूंजी का ताला पिता के इलाज के लिए खोल दिया। वो जनता था कि माँ और भाई दोनों के ही पास कुछ बचा नहीं है। पिता का इलाज चलता रहा लेकिन हालात में सुधार नहीं हो रहा था और फिर वो सुबह आयी जब ना पैसे बचे उसके पास और ना ही पिता। उसके पिता ने उसकी वास्तविकता को अपनाने की बजाये हमेशा नज़रअंदाज़ किया लेकिन आखिर समय में वो 'नाच-गाना' ही काम आया जिसके खिलाफ वो हमेशा थे। बुरे वक़्त में बड़े भाई को सहारा मिला तो उसकी आँखे भी खुल गयी। भले ही उसे पसंद ना हो लेकिन वो ये बात मान चुका था कि ये 'नाचने-गाने' वाला इस परिवार का एक अहम् हिस्सा है।
लॉकडाउन में जहाँ उसके रिश्तों में सुधार आया वहीं उसकी कला उससे बिछड़ गयी। अब नेताओं की रैलियों में तो भीड़ जमा हो सकती है लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विवाह समारोह का आयोजन बंद है। जो जमा पूंजी थी वो घर के ख़र्च और पिता के इलाज में लगा दी, लिहाज़ा भाई के साथ दुकान में हाथ बटाने के सिवाय उसके पास और कोई चारा नहीं था। लेकिन उसको उम्मीद है कि जल्द ही हालात बदलेंगे, सब सामान्य होगा और फिर से उसके पैरो में घुंघरू और हाथ में माईक होगा।